रीता गुलाबानी

मनोविदलता (Schizophrenia/स्किज़ोफ्रेनिया) एक मानसिक विकार है। इसकी विशेषताएँ हैं- असामान्य सामाजिक व्यवहार तथा वास्तविक को पहचान पाने में असमर्थता। लगभग 1% लोगो में यह विकार पाया जाता है। इस रोग में रोगी के विचार, संवेग, तथा व्यवहार में आसामान्य बदलाव आ जाते हैं जिनके कारण वह कुछ समय लिए अपनी जिम्मेदारियों तथा अपनी देखभाल करने में असमर्थ हो जाता है। ‘मनोविदलता’ और ‘स्किज़ोफ्रेनिया’ दोनों का शाब्दिक अर्थ है – ‘मन का टूटना’।
सिज़ोफ्रेनिया के कुछ प्रमुख लक्षण हैं, जैसे कि शुरूआत में
• रोगी अकेला रहने लगता है,
• वह अपनी जिम्मेदारियों तथा जरूरतों का ध्यान नहीं रख पाता,
• रोगी अक्सर खुद ही मुस्कुराता या बुदबुदाता दिखाई देता है,
• रोगी को विभिन्न प्रकार के अनुभव हो सकते हैं जैसे की कुछ ऐसी आवाजे सुनाई देना जो अन्य लोगों को न सुनाई दें, कुछ ऐसी वस्तुएं, लोग, या आकृतियाँ दिखाई देना जो औरों को न दिखाई दे, या शरीर पर कुछ न होते हुए भी सरसराहट, या दबाव महसूस होना, आदि,
• रोगी को ऐसा विश्वास होने लगता है कि लोग उसके बारे में बातें करते है, उसके खिलाफ हो गए हैं, या उसके खिलाफ कोई षड्यंत्र रच रहे हो,
• उसे नुकसान पहुँचाना चाहते हो, या फिर उसका भगवान् से कोई सम्बन्ध हो, आदि,
• रोगी को लग सकता है कि कोई बाहरी ताकत उसके विचारो को नियंत्रित कर रही है, या उसके विचार उसके अपने नहीं है,
• रोगी असामान्य रूप से अपने आप में हंसने, रोने, या अप्रासंगिक बातें करनें लगता है,
• रोगी अपनी देखभाल व जरूरतों को नहीं समझ पाता,
• रोगी कभी-कभी बेवजह स्वयं या किसी और को चोट भी पंहुचा सकता है,
• रोगी की नींद व अन्य शारीरिक जरूरतें भी बिगड़ सकती हैं।
यह आवश्यक नहीं की हर रोगी में यह सभी लक्षण दिखाई पड़े, इसलिए यदि किसी भी व्यक्ति में इनमे से कोई भी लक्षण नज़र आए तो उसे तुरंत मनोचिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।
सिज़ोफ्रेनिया किसी भी जाति, वर्ग, धर्म, लिंग, या उम्र के व्यक्ति को हो सकता है। अन्य बीमारियो की तरह ही यह बीमारी भी परिवार के करीबी सदस्यों में आनुवंशिक रूप से जा सकती है इसलिए मरीज़ के बच्चों, या भाई-बहन में यह होने की संभावना अधिक होती है। अत्यधिक तनाव, सामाजिक दबाव, तथा परेशानियाँ भी बीमारी को बनाये रखने या ठीक न होने देने का कारण बन सकती हैं। मस्तिष्क में रासायनिक बदलाव, या कभी-कभी मस्तिष्क की कोई चोट भी इस बीमारी की वजह बन सकती है।
नीचे दिए व्यवहारिक बदलाव रोगी को बिगड़ती अवस्था के संकेत हो सकते हैः
• शुरूआत में व्यक्ति लोगों से कटा-कटा रहने लगता है, तथा काम में मन नहीं लगा पाता,
• कुछ समय बाद उसकी नींद में बाधाएं आने लगती हैं,
• मरीज़ पेरशान रहने लगता है, तथा उसके हाव-भाव में कुछ अजीब बदलाव आने लगते हैं,
• वह कुछ अजीब हरकतें करने लगता है जिसके बारे में पूछने पर वह जवाब देने से कतराता है,
• समय के साथ-साथ यह लक्षण बढ़ने लगते हैं जैसे कि नहाना धोना बंद कर देना, गंदगी का अनुभव नहीं होना,
• समय से भोजन, या नींद न लेना, बेचैन रहना, खुद से बातें करना, हँसना, या रोना, लगातार शून्य में देखते रहना,
• चेहरे पर हाव-भाव का न आना,
• लोगों पर शक करना,
• अकारण इधर-उधर धूमते रहना,
• डर लगना,
• अजीबोगरीब हरकतें करना।
रोगी की सहायता
यदि आपको लगे की किसी व्यक्ति में यह लक्षण हैं तो-
• रोगी के व्यवहार में आए बदलाव देख कर घबरायें नही,
• याद रखे किसी भी ओर बीमारी की ही तरह यह भी एक बीमारी है जिसे सही सलाह से ठीक किया जा सकता है,
• अपना समय किसी झाड़-फूंक में व्यर्थ ना करें, यह एक मानसिक बीमारी है जिसका डॉक्टरी इलाज सम्भव है,
• व्यवहारिक बदलाव इस बीमारी के लक्षण है, न कि रोगी के चरित्र की खराबी,
• उसे सही-गलत का ज्ञान देने की कोशिश न करे क्योंकि मरीज़ आपकी बातें समझ पाने की अवस्था में नहीं है,
• यह बदलाव कुछ समय के लिए व्यक्ति के व्यवहार को असामान्य बना सकतें हैं व बीमारी के ठीक होने के साथ ही व्यक्ति का व्यवहार फिर से सामान्य हो जाता है,
• उसकी तथा दूसरों की सूरक्षा का ध्यान रखें,
• उसे तुरंत मनोचिकित्सक के पास ले जाएं,
• रोगी को नशा न करने दे,
• रोगी के आस-पास का वातावरण तनाव मुक्त रखने की कोशिश करें,
• रोगी के साथ साथ स्नेह पूर्वक व्यवहार करें,
• रोगी को मारे या बांधे नहीं बल्कि डॉक्टर की मदद से उसे दवा देकर शांत करने की कोशिश करें।
इलाज:
• इस रोग को दूर करने के लिए आजकल नई दवाईयों का इस्तेमाल हो रहा है जो कि काफी प्रभावशाली व सुरक्षित हैं,
• यह दवाईयां मुह में घुलने वाली गोली, टेबलेट व इंजेक्शन के रूप में उपलब्ध है,
• दवा के साथ-साथ रोगी को सहायक इलाज़ (सप्पोर्टिव थिरेपी) की भी आवश्यकता होती है।
• लक्षण दूर हो जाने पर भी दवा का सेवन तब तक न रोकें जब तक की चिकित्सक न कहें समय से पहले दवा का सेवन रोकने से बीमारी दोबारा हो सकती है,
• दवा से होने वाले कुछ अनावश्यक प्रभावों पर नजर रखें व जरूरत होने पर डॉक्टर की सलाह लें,
• चिकित्सक जब भी जाँच के लिए बुलाएँ समय पर जाँच जरूर करायें, भले ही रोगी पुरी तरह से लक्षणमुक्त क्यों न हो,
• यदि रोगी स्त्री है तो उसे गर्भधारण से पहले मनोचिकित्सक की सलाह लेना आवश्यक है,
• ताकि उसकी उसकी दवा में सही अनुपात में परिवर्तन करके उसको तथा गर्भ को किसी भी नुकसान से बचाया जा सके,
• स्तनपान कराते हुए भी चिकित्सकीय सलाह लेना आवश्यक है,
• रोगी की नींद व पोशक भोजन का ध्यान रखें, स्किजोफ्रेनिया के इलाज के लिए जो दवा दी जाती हैं वे काफी सुरक्षित हैं।
• अधिक मात्रा में पानी पीना.
• संतुलित पोशक आहार लेना.
• नियमित व्यायाम करना.
स्किज़ोफ्रेनिया का रोगी मुख्य लक्षणों के दूर होने के बाद दवा लेते हुए बिल्कुल सामान्य जीवन जी सकता है। वह अपनी क्षमता के अनुसार नौकरी कर सकता है, पढ़ सकता है, दोस्त बना सकता है तथा अपने सभी सपने पूरे कर सकता है। सिज़ोफ्रेनिया का रोगी लक्षण मुक्त होने के बाद शादी कर सकता है, परन्तु उसे ध्यान रखना होगा की उसके जीवन में आए नए परिवर्तनो का असर उसकी नींद, तथा दवा पर न पड़े। यदि रोगी स्त्री हैं तो वह बिना डाक्टरी सलाह के गर्भ धारण न करें। सिज़ोफ्रेनिया के रोगी के बच्चों में यह रोग अनुवांशिक रूप से जा सकता है, परन्तु ऐसा हमेशा हो यह ज़रूरी नहीं है।

(लेखिका आईएलबीएस, वसंत कुंज, नई दिल्ली से जुडी हुई हैं। )