आजकल हर रोज सुबह

अखबार पढ कर
शक होता है
कहीं यह अखबार
पुराना तो नहीं ?
फिर तारीख देखता हूं
वह तो
आज के दिन की होती है
यह क्या ?
यह रेप कांड तो कल भी हुआ था
यह आग तो कल भी लगी थी
आतंकवादियों ने कल भी
किसी जवान को शहीद किया था
नेताओं ने कल भी झूठे ख्वाब दिखाए थे
दिन कल भी बदलने वाले थे
कल भी किसी हीरोइन का
अपने हीरो से ब्रेकअप हुआ था
कल भी किसी नदी में बाढ आई थी
कल भी प्रदूषण की बात चली थी
कल भी जनता हाय हाय कर रही थी
आज भी वही खबरें हैं
बस सेहरों की तरह नाम बदले हैं
राग वही है , प्यार वही है
द्वेष वही है और ईर्ष्या वही है
क्या यह अखबार नया है ?
मैं खुद से ही सवाल करता हूं
और ऊब कर अखबार
एक तरफ रख देता हूं
क्या कल आयेगा अखबार नया ?

कमलेश भारतीय,
वरिष्ठ  पत्रकार