सुभाष चन्द्र

पार्टी विद ए डिफरेंस के जिस सूत्र वाक्य के साथ भारतीय जनता पार्टी ने भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की। क्रमागत तरीके से अपनी धमक बनाई, उसमें लालजी टंडन जैसे महारथी भी अपनी सांगठनिक कौशल का बेहतर योगदान देते रहे। एक भाजपा कार्यकर्ता से सांसद, केंद्रीय मंत्री और मध्य प्रदेश जैसे बडे राज्य का राज्यपाल बनने तक का उनका सफर कई धूप-छांव से गुजरा। बीते कुछ दिनों से बीमार रहने के बाद 21 जुलाई, 2020 को उन्होंने अपने कार्यक्षेत्र लखनउ के एक अस्पताल में अंतिम सांस लीं।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राज्य में राजकीय शोक की घोषणा की। प्रधानमंत्री और राष्ट्पति तक ने अपनी शोक संवेदना में जिस प्रकार के उदगार व्यक्त किए हैं, उससे लालजी टंडन के व्यक्तित्व का पता चलता है। लालजी टंडन एक लोकप्रिय राजनेता, कुशल प्रशासक व प्रख्यात शिक्षाविद थे। लालजी टंंडन शालीन, मृदुभाषी एवं जमीन से जुड़े हुए व्यक्ति थे। उन्हें राजनीति का लंबा अनुभव था, जिन्होंने लखनऊ के सांस्कृतिक परिष्कार और एक राष्ट्रीय गतिरोध के संयोजन को जोड़ा है। लालजी टंडन को समाज की सेवा के उनके अथक प्रयासों के लिए याद किया जाएगा। उन्होंने उत्तर प्रदेश में भाजपा को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने एक प्रभावी प्रशासक के रूप में अपनी पहचान बनाई, हमेशा लोक कल्याण को महत्व दिया।

बता दें कि लालजी बीते 11 जून को सांस लेने में तकलीफ और बुखार के चलते लखनऊ के मेदांता अस्पताल में भर्ती कराया गया था। 21 जुलाई शाम को दोबारा तबियत बिगड़ने पर उन्हें क्रिटिकल केयर वेंटिलेटर पर रखा गया। बीच-बीच में उनकी हालत में सुधार सूचनाएं भी मिलती रही हैं। लेकिन 21 जुलाई तड़के सुबह उनका निधन हो गया। लालजी टंडन के निधन की जानकारी उनके बेटे अशुतोष टंडन ने ट्वीट कर दी।

लालजी टंडन का जन्म 12 अप्रैल, 1935 में लखनऊ में हुआ था। अपने शुरुआती जीवन में ही लालजी टंडन आरएसएस से जुड़ गए थे। उन्होंने स्नातक कालीचरण डिग्री कॉलेज लखनऊ से किया। लालजी टंडन की 26 फरवरी शादी 1958 में कृष्णा टंडन के साथ हुआ। लालजी टंडन के तीन बेटे हैं, एक बेटा गोपालजी टंडन योगी सरकार में मंत्री हैं। मूल रूप से उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय रहने वाले टंडन प्रदेश की भाजपा सरकारों में कई बार मंत्री भी रहे हैं और अटल बिहारी वाजपेयी के सहयोगी के रूप में जाने जाते रहे। इन्होंने वाजपेयी के चुनाव क्षेत्र लखनऊ की कमान संभाली थी और निधन बाद लखनऊ से ही 15वीं लोकसभा के लिए भी चुने गए। लालजी टंडन का राजनीतिक करियर पार्षद बनने से शुरू हुआ था। उनके राजनीतिक करियर में कई उतार-चढ़ाव आए।
लालजी टंडन अटलजी को खुद कहते थे कि वह उनके दोस्त, पिता और भाई सब थे। 1952, 1957 और 1962 तक लगातार तीन चुनाव में मिली हार ने अटल जी का दिल लखनऊ से खट्टा कर दिया था। 1991 में उन्होंने यहां से चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया था। जब लालजी टंजन ने वजह पूछी तो उन्होंने हंसते हुए कहा था कि अभी भी कुछ बताने को बचा है क्या? लालजी टंडन ने उन्हें चुनाव लड़ने की जरूरत बताई और इसके साथ ही उन्हें भरोसा दिया कि लखनऊ अब उनके साथ है। वह सिर्फ नामांकन भरने के लिए आएं, बाकी चुनाव हम पर छोड़ दें। अटल जी तैयार हो गए और वह यह चुनाव जीते भी।

संघ से जुड़ने के दौरान ही लालजी टंडन की मुलाकात पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से हुई। धीरे-धीरे वह अटलजी के बहुत करीब आ गए। लालजी टंडन खुद कहते थे कि अटल बिहारी वाजपेयी ने राजनीति में उनके साथी, भाई और पिता तीनों की भूमिका निभाई। लालजी टंडन ने अपना राजनीतिक करियर 1960 से शुरू किा। वह दो बार सभासद चुने गए। दो बार विधान परिषद के सदस्य बने। वह इंदिरा गांधी की सरकार के खिलाफ जेपी आंदोलन से जुड़े और यहीं से उनके राजनीतिक सफर को उड़ान मिली।

90 के दशक में उत्तर प्रदेश में बनी बीजेपी और बीएसपी की सरकार में उनका अहम रोल था। बताया जाता है कि मायावती लालजी टंडन को राखी बांधती थीं और इसी के चलते उन्होंने लालजी टंडन की बात मानकर बीजेपी से गठबंधन किया। 1978 से 1984 तक और फिर 1990 से 96 तक लालजी टंडन दो बार यूपी विधानपरिषद के सदस्य रहे। 1991 में वह यूपी के मंत्री पद पर भी रहे। 1996 से 2009 तक लगातार तीन बार विधायक का चुनाव जीते। 1997 में वह नगर विकास मंत्री रहे। 2009 में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के बाद लखनऊ की लोकसभा सीट खाली हुई तो लालजी टंडन ने यहां से चुनाव लड़ा। 2018 में उन्हें उन्हें बिहार का राज्यपाल और फिर बाद में मध्य प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया।