नई दिल्ली। चुनावों से पहले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने न्याय की बात क्या कही, भाजपा के माथे पर बल पड़ गए। राहुल गांधी ने आम चुनावों के पहले चरण के मतदान से पहले न्यूनतम आय योजना यानी न्याय का ऐलान किया। इस योजना के तहत राहुल गांधी ने देश के करीब 5 करोड़ गरीब परिवारों की गरीबी मिटाने के लिए उन्हें हर साल 72,000 रुपए देने का ऐलान किया है। योजना का लक्ष्य देश के प्रत्येक गरीब परिवार की न्यूनतम आय 12 हजार रुपए मासिक करना है। देश के 20 फीसदी सबसे गरीब परिवार इस योजना से लाभान्वित होंगे। भारत में अमीरी और गरीबी की खाई बेहद गहरी है।

जाति, धर्म के भेद से कहीं ज्यादा मारक आर्थिक स्थिति का भेद है, जिस पर चर्चा करने से अमूमन राजनैतिक दल बचते हैं। हर राजनैतिक दल अपने एजेंडे में गरीबों की बात करता है, लेकिन जो योजनाएं बनती हैं, उनसे फायदा अमीरों को ही होता है। गरीबों को अक्सर सौगात जैसे शब्दों के बोझ से दबा दिया जाता है। रेलवे स्टेशन, बस अड्डे, धार्मिक स्थलों के बाहर, सरकारी अस्पताल, फुटपाथ, शहरों की झुग्गियों में भारत की गरीबी चीख-चीख कर अपनी दर्द बयां करती है। लेकिन इस चीख को हमेशा अनसुना कर दिया जाता है।

भारत का विकास सही मायनों में तभी हो सकता है, जब अमीरी-गरीबी की खाई को कम किया जाए। पूरी तरह पाटने की बात तो आकाशकुसुम तोड़ने जैसी है, क्योंकि साम्यवाद में इस तरह की आदर्श स्थिति होती है या फिर गांधीजी के सिद्धांतों में। फिलहाल भारत में पूंजीवादी राजनीति ने दोनों के लिए जगह नहीं छोड़ी है। इस स्थिति में राहुल गांधी के न्याय वाली बात से कम से कम यह आस बंधती है कि अमीरी और गरीबी के बीच की खाई कम होगी। राजनैतिक विश्लेषक इसे चुनाव के पहले बड़ा दांव कह रहे हैं और इसमें कुछ गलत नहीं है।

चुनाव में जीत के लिए जनता को यह तो बताना ही पड़ेगा कि वह आपको क्यों चुने, आप उसके लिए ऐसा क्या करेंगे कि वह आपके हाथों में देश की कमान सौंपे। यूपीए सरकार ने सूचना का अधिकार देकर देश के लोकतंत्र को मजबूत किया था और मनरेगा से अर्थतंत्र को। जब मनरेगा लागू हुआ था, तब भी इसकी व्यावहारिकता पर शक किया गया था, लेकिन गांव-कस्बों के गरीब जानते हैं कि इस योजना ने उन्हें सम्मानजनक जीवन जीने का मौका दिया। अब कांग्रेस की इस घोषणा पर भी टीका-टिप्पणियां शुरु हो गई हैं। कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इस योजना के लागू होने से देश के खजाने पर भारी प्रभाव होगा, क्योंकि इसकी सालाना लागत 3.6 लाख करोड़ रुपये आएगी। वाकई यह कोई मामूली रकम नहीं है। अगर देश के लगभग 25 करोड़ लोगों को गरीबी के दलदल से निकालना है, तो उसके लिए सरकार को खर्च तो करना ही पड़ेगा।

साल 2019-20 का बजट लगभग 27.84 लाख करोड़ रुपए का होगा, इस लिहा•ा से इस योजना के लिए बजट से लगभग 13 प्रतिशत चाहिए होगा, जीडीपी के हिसाब से यह लगभग दो प्रतिशत बनता है। आज के समय में केंद्र सरकार भोजन, उर्वरक, पेट्रोलियम से जुड़ी करीब 35 तरह की सब्सिडी मुहैया कराती है, जिनके लिए साल 2019-20 के बजट में तीन लाख 34 हजार करोड़ रुपए का $खर्च होना है। इस लिहाज से देखें तो एक योजना का खर्च, इतनी सारी सब्सिडियों के बराबर पड़ता है। ऐसे में योजना को क्रियान्वित करने के लिए बहुत सी सब्सिडियां कम करनी होंगी या खत्म करनी होगी। इनसे एक बड़ा तबका प्रभावित होगा। लेकिन कांग्रेस की न्यूनतम आय योजना एक तरह से एक हाथ दे, दूसरे हाथ ले, जैसी है। जिसमें एक ओर अगर रियायतें खत्म होंगी, तो दूसरी ओर खर्च करने के लिए गरीबों को सक्षम भी बनाया जाएगा।

भाजपा इस योजना से अभी से काफी परेशान नजर आ रही है। सोमवार को इसकी घोषणा के बाद वित्तमंत्री अरुण जेटली ने इसे कांग्रेस का धोखा बताया और कहा कि मोदी सरकार तो पहले ही डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) स्कीम से हर गरीब परिवार को हर साल लगभग 1,06,000 रुपये दे रही है। श्री जेटली को लगे हाथ ये भी बता देना चाहिए कि अगर ऐसा है तो भारत से गरीबी मिटी क्यों नहीं?

भाजपा कांग्रेस पर आरोप लगा रही है कि चुनाव जीतने के लिए वह गरीबों की बात कर रही है। लेकिन ऐसा कहते वह शायद भूल रही है कि मोदीजी ने तो सीधे 15 लाख हर भारतीय के खाते में डालने का वादा किया था, जो बाद में एक और जुमला ही साबित हुआ। बहरहाल राजनैतिक दलों को पूरा अधिकार है कि वे एक-दूसरे की आलोचना करें। लेकिन यह आलोचना तथ्यों और आंकड़ों पर होनी चाहिए। और आंकड़े बताते हैं कि पांच सालों में मोदी सरकार ने अपने प्रचार के लिए विज्ञापनों पर 5 हजार करोड़ से ज्यादा खर्च किए हैं।

आंकड़े यह भी बताते हैं कि दिसंबर 2017 तक बैंकों का एनपीए, यानी कर्ज में डूब चुकी राशि 8.86 ट्रिलियन रुपए थी, जो मार्च 2018 में बढ़कर 10.25 ट्रिलियन यानी 10 लाख करोड़ से ज्यादा रुपए हो चुकी थी। और अब मार्च 2019 तक तो यह और बढ़ चुकी होगी। बैंकों से पैसा लेकर भागने वाले या यहीं पर ऐश करने वाले गरीब लोग तो कतई नहींहोते। बल्कि इनमें से अधिकतर उद्योगपति, व्यापारी होते हैं, जो बड़े-बड़े कार्यक्रमों में सरकार की नीतियों की तारीफ करते हैं। अगर लाखों करोड़ रुपयों के कर्ज में डूबने का बोझ सरकारी खजाने पर डाला जा सकता है, तो गरीबों का जीवनस्तर सुधारने के लिए क्यों नहीं? नीतिआयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार को राहुल गांधी की इस योजना से इतनी फिक्र हुई कि उन्होंने राजकोषीय अनुशासन ध्वस्त होने की बात कही। बेहतर होता वे पहले संवैधानिक अनुशासन याद कर लें और जिस पद पर बैठे हैं उसकी गरिमा का निर्वाह करते हुए राजनैतिक बयानबाजी से दूर रहें।