भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगातार बेहतर स्थिति में

नई दिल्ली। केन्द्रीय वित्त एवं कॉरपोरेट मामलों की मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण की ओर से आज संसद में पेश की गई 2018-19 की आर्थिक समीक्षा में भारत के बाह्य क्षेत्र के लगातार स्थिर रहने की बात कही गई है। समीक्षा रिपोर्ट के अनुसार हालांकि 2017-18 के 1.8 प्रतिशत की तुलना में 2018-19 में चालू खाता घाटा जीडीपी की तुलना में 2.1 प्रतिशत अधिक रहा, फिर भी यह काबू में है। चालू खाता घाटे में बढ़ोतरी व्यापार घाटे की वजह से हुई है जो 2017-18 के 6.0 प्रतिशत से बढ़कर 2018-19 में 6.7 प्रतिशत पर पहुंच गया। व्यापार घाटे की सबसे बड़ी वजह 2018-19 में कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी रही। हालांकि विदेशों से भारत में धन भेजे जाने के मामले में बढ़ोतरी होने से चालू खाता घाटा में और वृद्धि थम गई। कुल मिलाकर हालांकि 2018-19 में जीडीपी के अनुपात में चालू खाता घाटा बढ़ा, लेकिन विदेशी बकाया ऋण में लगातार कमी का रूझान रहा।

आर्थिक समीक्षा में भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में लगातार बढ़ोतरी का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि यह 400 अरब अमेरिकी डॉलर अधिक के स्तर पर बना हुआ है। 2017-18 के दौरान अंतर-बैंकिंग मुद्रा बाजार में रुपया 65-68 प्रति डॉलर पर कारोबार करता रहा, लेकिन 2018-19 में डॉलर के मुकाबले और गिरकर 70-74 रुपये प्रति डॉलर के दायरे में जा पहुंचा। रुपये में यह गिरावट मुख्य रूप से कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव की वजह से रही। व्यापार के संदर्भ में देश की आयात क्रय क्षमता लगातार वृद्धि की ओर है। कच्चे तेल की कीमतों में निर्यात की तुलना में तेजी नहीं आने की वजह से है।

2018 के दिसंबर में भारत का विदेशी बकाया ऋण 521.1 अरब डॉलर था जकि मार्च, 2018 के तुलना में 1.6 प्रतिशत अरब डॉलर कम है। लम्बी अवधि का विदेश बकाया ऋण 2018 के दिसंबर में 2.4 घटकर 417.3 अरब डॉलर रहा गया। हालांकि देश के कुल विदेशी बकाया ऋण में इसकी हिस्सेदारी पिछले वर्ष की समान अवधि के 80.7 प्रतिशत के लगभग बराबर 80.1 प्रतिशत रही।

भारत के आयात-निर्यात बास्केट उत्पादन में 2017-18 की तुलना में 2018-19 में कोई खास बदलाव नहीं आया। 2018-19 में देश से कुल 330.7 अरब डॉलर मूल्य वस्तुओं का निर्यात हुआ। इनमें सबसे ज्यादा पेट्रोलियम उत्पादों, कीमती पत्थरों, दवाओं, सोना और अन्य कीमती धातुओं का निर्यात हुआ। इस अवधि में देश में कुल 514.03 अरब डॉलर मूल्य की वस्तुओं का आयात किया गया। आयातित वस्तुओं में कच्चा तेल, पेट्रोलियम उत्पाद, मोती, कीमती और अर्द्ध-कीमती पत्थर तथा सोना प्रमुख रहे। 2018-19 के दौरान भारत का व्यापार घाटा 183.96 अरब अमेरिकी डॉलर रहा। इस दौरान अमेरिका, चीन, हांगकांग, संयुक्त अरब अमीरात और सउदी अरब भारत के प्रमुख साझेदार बने रहे।

व्यापार सुगमता

भारत ने अप्रैल, 2016 में विश्व व्यापार संगठन के व्यापार सुगमता समझौता की पुष्टि की और इसके तहत ही राष्ट्रीय व्यापार सुगमता समिति का गठन किया। समिति ने देश के आयात और निर्यात के उच्च शुल्क को घटाने में अहम भूमिका निभाई है। इसकी वजह से सीमापार व्यापार तथा देश के भीतर कारोबारी माहौल को सुगम बनाने के मामले में भारत का प्रदर्शन काफी बेहतर हुआ है।

व्यापार से संबंधित लोजिस्टिक सेवाएं:

सरकार ने राष्ट्रीय लोजिस्टिक कार्य योजना के तहत राष्ट्रीय लोजिस्टिक नीति का मसौदा तैयार किया है। इसका मुख्य उद्देश्य आर्थिक विकास को गति देना और देश के व्यापार को वैश्विक स्तर पर अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना है। इसके लिए लोजिस्टिक सेवाओं को बाधारहित, सक्षम, विश्वसनीय और कम लागत वाली बनाने के उपाए किए जाएंगे।

परिदृश्य

अप्रैल, 2019 में जारी विश्व आर्थिक परिदृश्य रिपोर्ट में 2019 के मध्यावधि में वैश्विक स्तर पर उत्पादन में सुधार का अनुमान व्यक्त किया गया है। अनुमान लगाया गया है कि विकसित देशों द्वारा समोयोजित मौद्रिक नीति अपनाने तथा चीन और अमेरिका के बीच व्यापार तनाव का घटना इसमें बड़ी बड़ी भूमिका निभाएंगा। समीक्षा के अनुसार वैश्विक उत्पादन बढ़ने से कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का दबाव होगा, लेकिन इसके बावजूद इसका असर भारत पर नहीं पड़ेगा क्योंकि वैश्विक उत्पादन में वृद्धि भारत के निर्यात में भी सहायक बनेगी। सरकार की नीतियों के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मामले में और उदार बनने की संभावना है, जिससे चालू खाता घाटा को पाटने वाले संसाधन और स्थिर होंगे। अगर खपत मे कमी आती है और निवेश तथा निर्यात से अर्थव्यवस्था को गति मिलती है तो चालू खाता घाटे को कम किया जा सकता है।

 

 

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