मोदी सरकार, बच्चों को वर्नाक्युलर (मातृभाषा) में प्राथमिक शिक्षा मिले इस पर कर रही है विचार ?

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By Deepak Kumar Khaira 
वर्नाक्यूलर भाषा वह भाषा है जो किसी विशेष क्षेत्र के लोगों द्वारा प्रतिदिन बोलने में प्रयोग की जाती है या हम कह सकते हैं कि यह मूल भाषा है। भारत में कई स्थानीय भाषाएं हैं क्योंकि हमारे राज्य का पुनर्गठन उस क्षेत्र में प्रचलित भाषा पर आधारित था। आम तौर पर स्थानीय लोगों के लिए यह मातृभाषा है और यह विचारों को सीखने और समझने की सबसे आसान भाषा है।
संगठित भारतीय शिक्षा प्रणाली के लिए पहली पहल 1813 के चार्टर अधिनियम द्वारा की गई थी और भारत की शिक्षा प्रणाली के लिए 1 लाख रुपये का प्रावधान किया गया था। 1835 में ब्रिटिश सरकार (विलियम बेंटिक के प्रभुत्व के तहत) यह निर्णय लिया गया कि पश्चिमी विज्ञान और साहित्य पर आधारित शिक्षा भारतीयों को अंग्रेजी के माध्यम से प्रदान की जाएगी।
जे.बी. मैकाले का उद्देश्य केवल उच्च और मध्यम वर्ग के छात्रों को अंग्रेजी में शिक्षा प्रदान करना था और समय के साथ शिक्षा जनता तक पहुंच जाएगी, इसे Infiltration Theory कहा गया। मैकाले भारतीयों का एक ऐसा वर्ग बनाना चाहता था जो रंग और खून में भारतीय हो लेकिन स्वाद और संबद्धता में अंग्रेज हो।
आंग्लवादी चाहते थे कि अंग्रेजी शिक्षा का माध्यम बने लेकिन प्राच्यवादी चाहते थे कि शिक्षा का माध्यम वर्नाक्यूलर हो। वुड्स डिस्पैच (1854) और हंटर एजुकेशन कमीशन (1882-83) दोनों ने भारत की शिक्षा प्रणाली में वर्नाक्यूलर भाषाओं की भूमिका को मान्यता दी, इसलिए सिफारिश की कि प्राथमिक शिक्षा केवल वर्नाक्यूलर में होनी चाहिए, हाई स्कूल अंग्रेजी में और साथ ही वर्नाक्युलर मे हो  लेकिन विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा केवल अंग्रेजी माध्यम में होनी चाहिए। इसलिए भारतीयों ने एक विदेशी भाषा सीखना शुरू कर दिया जो बाद में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत भाषा बन गई।
आज अंग्रेजी हमारे जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा है, इसका कारण यह है कि दुनिया भर में हर पेशेवर पाठ्यक्रम अंग्रेजी में पढ़ाया जा रहा है। कंप्यूटर भाषा भी अंग्रेजी में है इसलिए उनके सभी स्रोत कोड अंग्रेजी भाषा में हैं इसलिए हम अंग्रेजी भाषा से बच नहीं सकते हैं। चीन जैसे कुछ ही देश हो सकते हैं, जहां चीनी भाषा पर आधारित उनका अपना सॉफ्टवेयर है।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि जब आप अपनी मातृभाषा या बोल चाल की भाषा में पढ़ रहे होते हैं तो स्मरण शक्ति बेहतर होती है। नर्सरी में 5 वर्ष की आयु के बच्चे के लिए मातृभाषा के अलावा कोई अन्य भाषा सीखना बहुत कठिन होता है। यहां तक कि 60% ऊर्जा भाषा सीखने के लिए लगभग बर्बाद हो जाती है और शेष 40%  विचारो को समझने में खर्च होती है। यहां तक कि इंजीनियरिंग या मेडिकल के छात्र, जिन्होंने हिंदी या किसी अन्य क्षेत्रीय भाषा में 12वीं पूरी की है, को केवल माध्यम परिवर्तन के कारण अध्ययन के लिए अधिक घंटे समर्पित करने पड़ते हैं। इसका कारण यह है कि उसकी ऊर्जा दो चीजों के लिए जा रही है, एक भाषा समझने के लिए और दूसरी पाठ्यक्रम सीखने के लिए। केवल एक वर्ष के बाद ही वह आवश्यक न्यूनतम स्तर तक अंग्रेजी भाषा को समझने में सक्षम होता है।
हम भारतीय अंग्रेजी को एक भाषा के रूप में नहीं बल्कि एक मानक (स्टैंडर्ड) के रूप में मान रहे हैं। जो छात्र अपने स्थानीय भाषा के स्कूलों से पेशेवर (प्रोफेस्नल) कॉलेजों में जा रहे हैं, वे एक हीन भावना में रहते हैं क्योंकि अन्य सहकर्मी हैं जो अंग्रेजी माध्यम से हैं और वे अंग्रेजी बोलने पर अपनी अच्छी पकड़ के कारण संकाय पर अच्छा प्रभाव डालते हैं। यह बहुत संभव है कि लेखन कौशल में ये गैर-अंग्रेजी माध्यम के लोग बेहतर प्रदर्शन करते हों। हम भारतीय क्यों नहीं समझ पा रहे हैं कि अंग्रेजी केवल एक भाषा है, इसका आपकी बुद्धि या योग्यता से कोई लेना-देना नहीं है।
महाराष्ट्र के एक लड़के के लिए मराठी में सीखना आसान है एवं एक तमिल लड़की के लिए तमिल में समझना आसान है, फिर हम सब एक माध्यम के रूप में अंग्रेजी क्यों सीखने जा रहे हैं, बल्कि इसे 8वीं तक विषय के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए या 12वीं कक्षा तक । अंग्रेजी माध्यम में पूरी शिक्षा उचित नहीं है। पिछले 40 वर्षों में गैर अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों के साथ-साथ छात्रों की संख्या में भारी गिरावट आई है।
5 से 10 वर्ष की आयु के बच्चों का दिमाग उर्वर ( fertile ) होता है इसलिए उनकी ऊर्जा  अंग्रेजी से मातृभाषा / मातृभाषा से अंग्रेजी में विचारों के अनुवाद के लिए  बर्बाद करने के बजाय गणित, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान या उनकी रुचि के किसी भी विषय को सीखने के लिए इस्तेमाल चाहिए।
यह काफी अच्छा है अगर आपको बोलने या लिखने के लिए अंग्रेजी का उचित ज्ञान है। यह उतना ही अच्छा या और भी अच्छा है यदि आप अपनी मातृभाषा के विशेषज्ञ हैं या अंग्रेजी के उचित और पर्याप्त ज्ञान के साथ हर विषय को समझने में सक्षम हैं।
हमें अपने बच्चों को ऐसी शिक्षा देनी है जो समझने में सहज हो और शिक्षा का माध्यम समझने में बाधा का काम न करे।
आम तौर पर हमारा दिमाग अपनी ही भाषा में सोचता है जिसे हम आम तौर पर अपने दैनिक जीवन में घर में इस्तेमाल करते हैं, वैसे ही विचार उसी भाषा के बोलने  में परिवर्तित हो जाते हैं लेकिन अगर आप अपनी मातृभाषा के अलावा अन्य भाषा में पढ़ते हैं तो प्रमुख ऊर्जा इस दोहरे अनुवाद के तरीके  में बर्बाद हो जाती है ।
रटने और समझने के बीच एक व्यापक अंतर है। इस दोहरे अनुवाद द्वारा अंतर को और बढ़ा दिया  गया है। रटना प्रकृति में अल्पकालिक है लेकिन समझना आपके मन और स्मृति में एक लंबे समय तक चलने वाला प्रभाव पैदा करता है। इसलिए माध्यम के अनुवाद की बाधा से बचने के लिए 12वीं तक या कम से कम 8वीं तक मातृभाषा में या स्थानीय भाषा में शिक्षा प्रदान करने की जानी चाहिए  है।  और अंग्रेजी एक विषय के रूप में ही पढ़ाया जाना चाहिए।
स्नातक या व्यावसायिक पाठ्यक्रम में अंग्रेजी के रूप में माध्यम उचित है क्योंकि नौकरी पाने के लिए आपको एक ऐसी भाषा सीखनी होगी जिसे आम तौर पर दुनिया भर में स्वीकार किया जाता है और भाषा के एक माध्यमिक मुद्दे के कारण आपको समझौता करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए ।
हाल ही में खबरों से पता चला है कि इंजीनियरिंग और मेडिकल कोर्स जैसे कई प्रोफेशनल कोर्स हिंदी माध्यम में आ रहे हैं। इन कॉलेजों के छात्रों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि विदेशो मे  उनकी डिग्री स्वीकार की जाएगी  या नहीं, साथ ही ऐसे छात्रों को हमारे देश में ही नौकरी मिलेगी, वह भी कुछ चुनिन्दा राज्यों में ही।
हमारा यह विचार पुरातन या पुराने जमाने का लगेगा  क्योंकि कुछ लोग सोच सकते हैं कि अंग्रेजी भविष्य है और अंग्रेजी के बिना कोई भविष्य नहीं है। हम नौकरी या शिक्षा में अंग्रेजी की भूमिका से इनकार नहीं कर सकते हैं लेकिन यह सुझाव दिया जाता है कि हाई स्कूल तक अंग्रेजी एक विषय के रूप में बेहतर भूमिका निभा सकती है और उसके बाद अंग्रेजी माध्यम के रूप में स्वीकार्य है।
                                                                                                                                                                                                                                          (writer is 1998 Batch IRAS)

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