धरती माँ के संरक्षण में सतत प्रयासरत छत्तीसगढ़ सरकार

रायपुर। हम सभी जानते हैं कि एक पारिस्थितिक तंत्र में मानव-जीव, पौधे और जानवर आपस में मिलकर मौसम, पृथ्वी, सूर्य, मिटटी, जलवायु और वातावरण को प्रभावित करते है. इस तंत्र का पृथ्वी से गहरा सम्बन्ध है.पृथ्वी ब्रह्मांड की वह अनमोल ग्रह है जो हमारे लिए जीवनदायिनी प्राकृतिक संसाधन रखती है. परन्तु दशकों से प्राकृतिक संसाधन मानव के अप्राकृतिक व्यवहार के कारण दिन-प्रतिदिन बिगड़ रहे है. इस प्रकार संकट में आ रहे वातावरण के कारण जंगली-जानवर विलिप्त हो रहे है, पेड़-पौधे घटते जा रहे है, कारखानों से निकलती कार्बन-डाइऑक्साइड बढ़ती जा रही है, ऑक्सीजन घटती जा रही है. नतीजतन प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग, और अन्य पर्यावरणीय असंतुलन की काली छाया घिरती जा रही है. अगर ये सिलसिला नहीं थमा तो मानव जाति को अपना अस्तित्व बचाना नामुमकिन हो जायेगा.
इस नाकारात्मकता को कम करने की प्रतिज्ञा लेते हुए संयुक्त राष्ट्र ने सन 2009 में एक प्रस्ताव पारित कर अंतर्राष्ट्रीय माँ पृथ्वी दिवस मनाये जाने की वकालत की. इसका संकल्प बोलीविया के प्लुरेंसी राज्य द्वारा प्रारंभ किया गया और 50 से अधिक सदस्य राज्यों ने इसका अनुमोदन किया था. तब से हर वर्ष पृथ्वी को माता का रूप मानकर इसके पारिस्थितिक तंत्र की रक्षा के लिए अपने कर्तव्य का बोध कराता है. एक माँ वह है जिसने हमें जन्म दिया हमारा पालन-पोषण किया. दूसरी माँ धरती माँ है जो हमें हमारी जरुरत की सभी प्राकृतिक संसाधनों से लालन-पालन तथा उचित पोषण देती है. इसी के स्नेहमयी गोद में हमारा बचपन, जवानी तथा बुढ़ापा बीतता है. हमारी जन्म देनेवाली माँ बीमार पड़ जाती है तो हमारी नींद उड़ जाती है जबकि इस माँ ने दो-चार बच्चो को ही जन्म दिया है. वही धरती माँ जिसके कई करोड़ लाल है और उसे जब प्रदूषक तत्वों की वजह से पीड़ा होती है, वह दर्द से कराहती है तो कोई सँभालने वाला नहीं मिलता. परन्तु यह ख्याल रहे जब कभी यह माँ नाराज होगी तो ग्लोबल वार्मिंग जैसे प्रलयंकारी घटनाओं के माध्यम से हमारा सब-कुछ छीन जायेगा.
प्राचीन परम्पराओं में पेड़-पौधों, नदी-पर्वत, ग्रह-नक्षत्र, अग्नि-वायु सहित प्रकृति के विभिन्न रूपों के साथ मानवीय रिश्ते जोड़े गए हैं. पेड़ को संतान, नदी को मां, ग्रह-नक्षत्र, पहाड़ और वायु देवरूप माने गए हैं. ताकि मनुष्य प्रकृति को गंभीर क्षति न पहुंचा सके तथा उसे प्रकृति के संरक्षण का भान होता रहे. आधुनिक भारत में महात्मा गाँधी जी ने भारतवासियों से प्रकृति के इन अनमोल तत्वों के गलत उपयोग के लिए चेताया था. इक्कीसवी सदी में उर्जा की सतत बढ़ती मांग प्राकृतिक संसाधनों का जमकर दोहन कर रही है. हमारे विकास की प्रत्येक गतिविधि पर कोयला, पेट्रोल डीजल आदि का अधिपत्य हो रहा है. दुनिया भर में सरकारों का प्रयास है कि अधिक से अधिक लोगों तक बिजली पहुंचाई जाय. उद्योग-धंधे, परिवहन, घरेलू कार्य हेतु – हर जगह बिजली की मांग निरंतर बढ़ती जा रही है. औद्योगिक क्षेत्रों में कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड की मात्रा में वृद्धि हो रही है। इसके अतिरिक्त अनेक प्रकार के हाइड्रोजन, क्लोरिन, नाइट्रोजन के ऑक्साइड अमोनिया, बेरीलियम, सीसा, आर्सेनिक, केडमियम, एस्बेस्टास, बेंजोपाइरिन एवं मुख्य रूप से रेडियोएक्टिव पदार्थ हैं, जिनके कारण दमा, श्वसनी-शोथ गले का दर्द आदि रोग होते हैं। अति प्रदूषित वायु में अधिक समय तक रहने से फेफड़े का कैंसर जैसे घातक रोग होने की संभावना रहती है. बावजूद इसके ईंधन का प्रयोग करना हमारी जरुरत और मजबूरी दोनों है.
इन जरूरतों और मजबूरियों में संतुलन बैठाते हुए छत्तीसगढ़ सरकार ने कई महत्वपूर्ण कार्य किये है. प्रदूषण की रोकथाम के उद्देश्य से छ.ग.पर्यावरण संरक्षण मंडल की स्थापना की. मंडल द्वारा 17 प्रकार के 146 प्रदूषणकारी उद्योगों को ऑनलाइन कंटीन्यूअस स्टेक इमीशन मोनिटरिंग सिस्टम की स्थापना की. ऐसा करके सरकार ने खासकर कार्बन-डाइऑक्साइड से प्राकृतिक तत्वों के नुक्सान पर अंकुश लगाने की तरफ बेहतर पहल की. नेशनल ग्रीन कोर कार्यक्रम के अंतर्गत प्रदेश के स्कूलों में वर्ष 2003 में जहाँ मात्र 1600 इको-क्लब थे वही वर्ष 2016 तक बढ़कर 6750 इको-क्लब कार्यरत है. कार्बनिक तत्वों के दुष्प्रभावों को कम करने में कारगर वृक्षारोपण के लिए मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने हरियर छतीसगढ़ योजना का एक अनूठा कदम उठाया. आज छत्तीसगढ़ का वन-क्षेत्रफल अपने पूरे क्षेत्रफल का 44.21% का हो गया. रायपुर शहर के मध्य देश का पहला “ऑक्सी-जोन” का निर्माण भी कई मायनों में जीवन-सीमा बढ़ाने में कारगर कदम साबित होगा. शहर की जैविक और अजैविक कूडो से होने वाले रासायनिक दुष्प्रभावों से निपटने के लिए रीसाइक्लिंग प्लांट की व्यवस्था की गयी है. इस दिशा में अंबिकापुर नगर निगम भारत का प्रथम कूडामुक्त निगम बना है जहाँ “गार्बेज से सोना” जैसी योजना इतिहास लिख रही है. प्रदेश के नारायणपुर जिला में यूनिसेफ की पहल से समुदाय-चालित न्यूट्रिशनल गार्डन बनाई गयी है. इस गार्डन से लोगो को कुपोषण से मुक्ति के साथ पर्यावरण सुधार की आस जगी है. ग्लोबल वार्मिंग को 2 डिग्री कम करने की पहल में कदम बढ़ाते हुए जून 2017 में बीजिंग में अंडर 2 कोलिशन का सदस्य बनने वाला छ.ग. भारत का दूसरा राज्य बन गया है.
छत्तीसगढ़ सरकार ने पर्यावरण बचाओ के सन्दर्भ में पृथ्वी पर स्वस्थ जीवन को निरंतर रखने के लिए प्रभावी कदम उठा रही है और यह सरकार की प्रतिबद्धता भी है. यहाँ सरकार के साथ-साथ हमारी भी जिम्मेदारी है की हम पर्यावरण के अनुकूल गतिविधियों को अपनाकर पूरे ब्रह्मांड को बचाए.

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